Sunday, July 1, 2012

Jalte Hain Jiske Liye ( जलते हैं जिसके लिए )

मजरूह सुल्तानपुरी का यह गीत अपने आप में सुन्दर तो है ही किन्तु स्वर्गीय तलत महमूद की आवाज़ इस गीत को एक अलग ऊँचाई प्रदान करती है |

कवि : मजरूह सुल्तानपुरी 

जलते हैं जिसके लिए तेरी आँखों के दीये 
ढुंढ लाया हूँ वही गीत मैं तेरे लिए

दर्द बन के जो मेरे दिल में रहा, ढल न सका
जादू बन के तेरी आँखों में रुका, चल न सका
आज लाया हूँ वही गीत मैं तेरे लिए | जलते हैं ......

दिल में रख लेना इसे हाथों से ये छुटे न कहीं
गीत नाजुक है मेरा शीशे से भी टूटे न कहीं
गुनगुनाऊंगा यही गीत मैं तेरे लिए | जलते हैं ......

जब तलक न ये तेरे रस के भरे होठों से मिले
यूँ ही आवारा फिरेगा ये तेरी जुल्फों के तले
गाये जाऊंगा यही गीत मैं तेरे लिए | जलते हैं .........

Friday, June 29, 2012

Ei Meghla Dine Ekla ( एई मेघला दिने एकला )

आज का गीत एक पुराना बंगाली गीत है | हेमंत दा की आवाज़ में यह गीत सुनकर मन प्रसन्न हो गया | 

कवि : गौरीप्रसन्ना मजुमदार

एई मेघला दिने एकला घोरे थाके नातो मोन
काछे जाबो कोबे पावो ओगो तोमार निमोंत्रण
एई मेघला ......

जुथी बोने ओई हवा, कोरे शुधु आशा जावा
हाय हाय रे, दिन जाई रे, भारे आंधारे भुबोन
काछे जाबो ........

शुधु झोरे झोरो झोरो, आज बारी शारा दिन
आज जेनो मेघे मेघे, होलो मोनजे उदाशीन

आजी आमी खोने खोने, कि जे भाबी आनो मोने
तुमि आशबे, ओगो हांश्बे, कोबे होबे शी मिलों
काछे जाबो .........
एई मेघला ..........

इसका टूटा-फुटा हिंदी अनुवाद कुछ यूँ है :

ओ मेघा, मन है मेरा बैचेन
पास न आओ, कैसे मिले चैन
कब आएगा तुम्हारा निमंत्रण

चमेली की कतारों से आती है हवा
हाई हाई रे, दिन जाय रे, छाया है घना अन्धकार

तूफानी हवा संग आया सावन 
झर झर बरसे आज सारा दिन 
क्यों है मेरा मन उदासीन

पल पल होता मन व्याकुल
तुम कब आओगे, मुस्कुराओगे
कब होगा हमारा मिलन

Wednesday, June 27, 2012

Bula Raha Hai Koi Muzko ( बुला रहा है कोई मुझको )

एक बार फिर इंडियन ओशीयन का गीत लिख रहा हूँ | यह गीत भी उनके नए एल्बम '१६/३३० खजूर रोड' से है | इस गीत के बोल मुझे अपने कॉलेज के दिनों का स्मरण कराते हैं, जब दिल में कुछ बनने की, कुछ कर दिखाने की एक आग सी लगी थी | तब उसका सच्चाई के सागर से सामना नहीं हुआ था ना :) | 

कवि : संजीव शर्मा 

बुला रहा है कोई मुझको
लुभा रहा है कोई 
टिके है पाँव जमीं पर 
है इम्तिहान की घड़ी |

पाँव जमीं पर आसमाँ पे नज़र ........
पाँव जमीं पर आसमाँ पे नज़र ........

बुला रहा है कोई मुझको
लुभा रहा है कोई 
है बंद गली के उस तरफ 
खुले आसमाँ की जमीं |

बादल गरज रहे उड़ चला है मन ......

Tuesday, June 26, 2012

Man Re Tu Kahe Na ( मन रे तू काहे न धीर धरे )

कई बार मन एक बेलगाम घोड़े की तरह किसी भी दिशा में सरपट दौड़ने लगता है तो कभी उन बातों को लेकर विवल हो उठता है जिसका उस पर उसका कोई नियंत्रण ही नहीं | ऐसे ही क्षणों के लिए शायद साहिर लुधियानवी ने यह गीत लिखा है | 

कवि : साहिर लुधियानवी 

मन रे तू काहे न धीर धरे 
ओ निर्मोही , मोह न जाने, जिनका मोह करे 
मन रे तू काहे न धीर धरे |

इस जीवन की चढ़ती ढलती 
धूप को किसने बाँधा 
रंग पे किसने पहरे डाले 
रूप को किसने बाँधा 
काहे ये जतन करे | मन रे .......

उतना ही उपकार समझ
कोई जितना साथ निभा दे
जनम मरण का मेल है सपना
ये सपना बिसरा दे 
कोई न संग मरे | मन रे .......

यह गीत सुनकर पता नहीं क्यों मुझे लगता है कि यह गीत अधूरा है | हो न हो साहिर साहब ने इस गीत में एक या दो पद और लिखे होंगे जो फिल्म में सम्मिलित नहीं किये गए | खैर मैंने अपनी सीमित क्षमता से इस गीत में चार पंक्तियाँ जोड़ी है | आशा है जब परलोक में साहिर साहब से भेंट होगी तो वे मुझे इसके लिए क्षमा करेंगे :) |

इतना तू सोचे मगर 
करने वाला और 
इच्छा की तूने सीमा न जानी
देने वाला और
काहे तू स्वप्न बुने | मन रे तू कहे न धीर धरे .... |

Monday, June 25, 2012

Baanwra Man Dekhne Chala ( बाँवरा मन देखने चला )

कवि : स्वानंद किरकिरे

बाँवरा मन देखने चला एक सपना 
बाँवरे से मन की देखो बाँवरी हैं बातें 
बाँवरी सी धड़कने है बाँवरी है साँसे
बाँवरी सी करवटों से निंदिया दूर भागे
बाँवरे से नैन चाहे
बाँवरे झरोखों से
बाँवरे नजारों को तकना | बाँवरा मन ......

बाँवरे से इस जहां में
बाँवरा एक साथ हो 
इस सयानी भीड़ में 
बस हाथों में तेरा हाथ हो
बाँवरे सी धुन हो कोई 
बाँवरा एक राग हो 
बाँवरे से पैर चाहे 
बाँवरे तरानों पे
बाँवरे से बोल पे थिरकना | बाँवरा मन .........

बाँवरा सा हो अँधेरा 
बाँवरी खामोशियाँ 
थरथराती लौ हो मद्धम
बाँवरी मदहोशियाँ 
बाँवरा एक घुंघटा चाहे
होले होले बिन बताये 
बाँवरे से मुख से सरकना | बाँवरा मन ..........

Sunday, June 24, 2012

Dheu Bhaange Paar Bhaange ( धेऊ भांगे पार भांगे )

आज का गीत इंडियन ओशीयन के ताज़ा एल्बम '१६/३३० खजूर रोड' से है | मैं इसका पूरा अर्थ तो नहीं जानता किन्तु यह नाविकों द्वारा गाया जाने वाला एक बंगाली लोकगीत लगता है | इसमें कवि अपने मन की अवस्था की तुलना नदी की लहरों से कर रहें है | वे कहते है कि नदी की लहरों की ही तरह उनका मन दौड़ रहा है | बाकी का अर्थ आप अपने किसी बंगाली मित्र से पूछ सकते हैं :) |

कवि : अविक मुखोपाध्याय

धेऊ भांगे पार भांगे 
मोनो आमार भांगे 
धेऊ भांगे पार भांगे 
शोपनो आमार भांगे 
आमार भांगा ह्रदय 
शोना लागे, तोरी ताने रे | धेऊ भांगे ..........

नोदिर पानी चोकेर पानी
नोदि होइया बोय
एई नोदि तुई देखलि आतो 
चोखे डोरे नार | धेऊ भांगे .......

ओर खोसेते पागल होईला 
तोरे प्राणेते प्राण 
आशार गुंजीते पाइला 
आमार नाम || 

Friday, June 22, 2012

Din Dhal Jaye ( दिन ढल जाए )

कवि : शैलेन्द्र


दिन ढल जाए हाय रात न जाये 
तू तो न आये तेरी याद सताए | दिन ढल जाए ....

प्यार में जिनके सब जग छोड़ा और हुए बदनाम 
उनके ही हाथों हाल हुआ ये बैठे है दिल को थाम 
अपने कभी थे अब है पराये | दिन ढल जाए .....

ऐसी ही रिमझिम ऐसी फुवारै, ऐसी ही थी बरसात 
खुद से जुदा और जग से पराये हम दोनों से साथ 
फिर से वो सावन अब क्यों ना आये | दिन ढल जाए .......

दिल के मेरे पास हो इतने फिर भी हो कितनी दूर 
तुम मुझसे, मैं दिल से परेशां दोनों है मजबूर 
ऐसे में किस को कौन मनाये | दिन ढल जाए .......